Bhed : Bhartiya Samaj

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भारतीय परिवेश में भेड़ एक ऐसा जानवर है जिससे लोग इस कदर परिचित हैं कि उसकी कार्यशैली को कारण उसका कई मुहावरों में भी प्रयोग किया जाता रहा है। पाश्चात्य संस्कृति को अंगीकार करने वाली या यूँ कहें कि पाश्चात्य संस्कृति की ओर झुकाव रखने वाली आज की वर्तमान पीढ़ी भले ही हिंदी मुहावरों के प्रयोग से भले ही परहेज़ हो, पर वो भी भेड़ से अनभिज्ञ नहीं है।

मेरी नज़र में भेड़ एक सीधा साधा जानवर है, शायद इसीलिए भेड़ को जैसे चाहे वेसे हाँका जाना भी संभव है। खेर, जब मैंने भेड़ शब्द का प्रयोग भारतीय समाज के परिदृश्य में किया है तो मेरा उद्देश्य इस ओर इंगित करने का है कि भारतीय समाज को भी बड़ी सहजता से भेड़ चाल की तर्ज पर ही एक एक निशचित दिशा में हाँका जा सकता है।

बहुत पुरानी बात है सदियों पुरानी नहीं बस तकरीबन 25 साल पहले यानी की मेरे बचपन की तो उस वक़्त में स्कूल में पैड रहा था एक दिन प्रिंसिपल / हेडमास्टर के रूम में जाने का अवसर मिला रूम बहुत ही साधारण तरीके से सजा हुआ था उस वक़्त महंगे डिस्टेम्पर का नहीं कली का इस्तेमाल किया जाता था तो हेडमास्टर का रूम सफेद काली से रंग हुआ एक बाद से कमर था ठंडक बनाये रखने के लिए बहुत सारी खिड़कियां और हा छत पर एक बाद से पंखा रूम के बीचो बीच एक साधारण परंतु बाद से लकड़ी का टेबल और उस पर रखा हुआ गुलाब के फूलों का एक गुलदस्ता और कुछ पेपर रजिस्टर पेन पेंसिल आदि बस सजावट के नाम पर गुलदस्ते के अलावा और कुछ विशेष नहीं और जहां तक दीवार की बात की जाए तो हेडमास्टर की कुर्सी के ठीक पीछे 3 तस्वीरें गांधी की बीचो बीच और दोनो तरफ सुभाष एवं पटेल । थोड़े शब्दों में कहा जाए तो एक साधारण सा कमर जोकि कुछ प्रेरणा दयाक तस्वीरों से सजाया हुआ था । 

उसी स्कूल के बाकी कमरे भी उसी तरह के साधारण एवं प्रेरणा दयाक तरवीरों से सजे हुआ बरामदे की दीवारों पर भी कुछ पेंट की गयी तस्वीरें कमरो एवं बरामदों को मिला का देखा जाए तो मुख्य रूप से गांधी भगत सुबाष पटेल कृष्ण कुरुक्षेत्र महाराणा प्रताप शिवजी महराज आदि 

और अगर पाठ्यक्रम की बात की जाए तो बहुत कुछ ऐसा है जिसे वर्णन योग्य कहा जा सकता है परंतु सभी कुछ लिख पाना संभव नहीं परंतु संक्षेप में लिखा जाए तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी के विबिन्न आंदोलन जैसे की भारत छोड़ो आंदोलन सुबाष की आजाद हिन्द फ़ौज़ भगत का असेम्बली में बम्ब फोड़ना चंद्रशेखर का आजाद मरना पटेल का लौहपुरुष कहलाये जाने से संबंधित कहानी और पटेल का भारतीय स्टेट्स को मिलाकर एक भारत का निर्माण भारत का विभाजन नेहरू का प्रथम प्रदानमंत्री के तौर पर उपलब्धियां आदि संक्षेप में कहा जाए तो कह सकते है की पाठ्यक्रम में गांधी पटेल सुभाष भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद नेहरू आदि छाए हुए थे इसके अलावा कई अन्य नाम भी गिनवाए जा सकते है परंतु फिर कभी

कुछ सालो बाद जब उच्च शिक्षा के लिए दूसरे स्कूल में जाने का अवसर मिला तो वहां पर माहौल थोड़ा बदल हुआ मिला यहां पर थोड़ी ज्यादा तड़क भड़क दिखाई दी परंतु अगर तड़क भड़क को निकल दिया जाए तो मोठे तौर पर जो बचेगा वो वही सब था जो पुराने स्कूल में था यानी की वही प्रेरणा दयाक तस्वीरें वही प्रेरणा दयाक पाठ्यक्रम (थोड़ा विस्तृत परंतु मूल रूप से वही सब)

कुछ और साल गुजरे और फिर जनरल पाठ्यक्रम से निकल कर स्पेसिफिक पाठ्यक्रम में जाने का अवसर मिला और मैन साइंस को अपना पाठ्यक्रम चुना तो अचानक गांधी नेहरू पटेल सुभाष आदि गायब हो गए और सल्फ्यूरिक एसिड, नामक का क्षार रिलेटिविटी फ़ोर्स टार्क आदि daily लाइफ का हिस्सा बन गए । कुछ और साल गुजरे और यूनिवर्सिटी तक दस्तक दे दी यहां पर वही सब रिलेटिविटी क्वांटम एस्ट्रोलॉजी फ़ोर्स टार्क आदि ही डािलय लाइफ का हिस्सा बने परंतु बहुत विस्तार से । विशेष बात यही की यूनिवर्सिटी में अचानक गंदी नेहरू पटेल आदि फिर से एक बार सामने आ गए । ऐसा बिल्कुल नहीं है की पाठ्यक्रम में आ गए परंतु दीवारों पर तस्वीरों के रूप में सड़कों पर लगे हुए बूत के रूप में भाषणों में जिक्र के तौर पर । 

तो मोठे तौर पर यह कहा जाए की गांधी नेहरू पटेल सुभाष भगत चंद्रशेखर आदि नर्सरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक किसी न किसी रूप में साथ रहे 

अगर पढ़ाई से अलग रहकर बात की जाए तो भी इन सभी महान व्यक्तियों को हम आज भी अपने आस पास महसूस कर सकते है । कही जाते वक़्त जब रास्ते का नाम गांधी रोड या पटेल मार्ग दिखाई दे जाए या किसी चौराहे पर भगत सिंह का बूत दिखाई दे जाए तो अनायास ही याद आ जाएगी

यह उचित भी है इसीलिए क्योंकि इन महान व्यक्तियों के जीवन से सीखने के लिए बहुत कुछ लिया जा सकता है और अगर वही सीखा हुआ अपने जीवन में उतार जा सके तो कहने ही क्या

परंतु यह संभव नहीं क्योंकि हम में से अधिकांश भेड़ें है

एक दिन का वाक्या है शायद उन दिनों का जब पटेल की विशाल मूर्ति बनाई जा रही थी उस वक़्त बातचीत में किसी मित्र ने कह दिया की पटेल को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे । मेरी पूछने की इच्छा थी की मित्र बताओ क्या कमी है और खान पर परंतु नहीं पूछा । परंतु अगर पूछता तो शायद कोई ऐसा जवाब नहीं मिल पता जो तथ्यों पर आधारित हो । और यह स्टेटमेंट मित्र का अपना नहीं था यह निश्चित है क्योंकि यही स्टेटमेंट बहुत सारे लोग अचानक ही दे रहे थे इन मित्र से पहले भी कुछ लोग यही कहते हुए सुने गए । और ऐसा नहीं है की यह बहुत पुराण स्टेटमेंट हो यह अचानक ही पोलटिकल पार्टीज द्वारा उछाल गया वक्तव्य है । कुछ सप्ताहों बाद यही वाक्य एक महिला से सुनने को मिला 

परंतु लोगों को ऐसा क्यों लगता है ?

मेरे पास इसका एक ही जवाब है क्यों की हम भेड़ें है हम अपने दिमाग से सोचने का काम नहीं लेते कुछ ज्यादा समझदार लोग हमें अपनी सोच एवं एक्शन के अनुसार हांकते हैं

पटेल हमेशा से महत्वपूर्ण थे उनका योगदान महत्वपूर्ण था परंतु राजनीतिक परिवेश में अचानक एक विशेष पार्टी एवं उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए पटेल को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया । पटेल ही क्यों ? शायद इसीलिए क्योंकि पटेल एक विशेष प्रान्त से संबंधित रहे है और उनका कद नेहरू गांधी से समकक्ष है

ऐसे में राजनीतिक परिवेश को पटेल की आवशकता हुई और सोशल मीडिया एवं दूरसंचार के माध्यम से लोगों के दिमाग में यह बैठा दिया गया की पटेल को अधिक पसंद किया जाना चाहिए । हालांकि पटेल को चुने जाने के पीछे कारण मेरे विचार से उनका एक विशेष प्रान्त से होना ही है परंतु शायद इसका एक कारण और भी हो सकता । हाल ही में एक घटना पड़ने को मिली जोकि पटेल को कट्टर हिन्दू की छवि में दिखती है (मेरे व्यक्तिगत विचार यह है की या तो घटना सत्य नहीं है या फिर घटना को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया) ऐसे में एक पार्टी विशेष को गांधी के स्थान पर पटेल ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देना स्वाभाविक जान पड़ता है

खेर मेरे विचार से पटेल का आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और उन्हें उचित समान भी हासिल हुआ परन्तु पटेल वर्तमान नहीं भूत है 

यदि कोई व्यक्ति तथ्यात्मक रूप से यह साबित कर पाए की पटेल को उचित समान नहीं दिया गया तो में अवश्य जानना चाहूंगा

पटेल का अचानक पटल पर आना और गांधी का पटल पर धूमिल होना एक साथ ही हुआ वर्तमान में गांधी और गोडसे में से बहुत सारे लोग गोडसे को चुनना चाहते है और इसके पीछे जो तर्क दिए जा रहे है वो भावुकता की कसौटी से आगे नहीं बाद पाते

भारत का विभाजन एक महत्वपूर्ण घटना थी परंतु न तो ऐसा पहली बार हुआ और ना ही आखिरी बार बल्कि यह कहा जाए की वर्तमान पीढ़ी का इस घटना से कुछ इमोशनल लगाव हो सकता है तो यह सिर्फ एक कल्पना लगती है वर्तमान पीढ़ी पैदा ही विभाजन के बाद हुई है । विभाजन होना चाहिए था या नहीं इसपर अलग अलग विचार हो सकते है परंतु ऐतहासिक तथ्य यह है की उस वक़्त महात्मा गांधी नेहरू पटेल आदि बड़े नेता थे और वही जनता को नेतृत्व प्रदान कर रहे थे ऐसे में निर्णय करने का अधिकार भी जनता ने अपने नेताओं को ही सौंपा और नेताओं ने जो उचित था उस वक़्त के माहौल में उसके अनुसार निर्णय ले लिया । हालांकि कुछ लोग महात्मा गांधी को बड़े नेता के रूप में भी स्वीकृति नहीं देंगे परंतु शायद उनका यह तर्क चुनाव के नतीज़ों के द्वारा पोषित नहीं होता विभाजन से फके एवं बाद में होने वाले नतीजे स्पस्ट करते है की महात्मा गांधी सबसे बड़े नेता थे और इसे झूठलाया नहीं जा सकता ।

इसके अतिरिक्त गांधी नेहरू के द्वारा भारत तो सेक्युलर कंट्री बनाया जाना भी एक कारण गिनवाया जाता है स्पस्ट है की हिन्दू महासभा एकमात्र संगठन रहा है जोकि हिन्दू राष्ट्र का समर्थक था और भारत की जनता से उसे चुनाव में हरा कर हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग को पूरी खारिज़ का दिया था  । सेक्युलर कंट्री बनाने का निश्च जनता ने किया और गांधी नेहरू पटेल ने एक मूरत रूप दिया इसका विरोध किया जा सकता है परंतु आरोप अगर गांधी पर लगाया जाता है तो स्पस्ट है की भारत की जनता पर भी आरोप लगाया जाना चाहिए ।

भारत के विभाजन पर पाकिस्तान को कुछ धनराशि एवं एक गलियारा देने के विषय में सुना है की गांधी के समर्थन के कारण बहुत सारे तर्क दिए जा रहे है परंतु स्पस्ट है की पाकिस्तान जब बनाया गया तब एक दुश्मन नहीं बनाया जा रहा था बल्कि एक देश बनाया जा रहा था वर्तमान में हो सकता है की भारत पाकिस्तान दो दुश्मन देश हो परंतु 1947 में गांधी या नेहरू या पटेल के सामने पाकिस्तान एक दुश्मन देश नहीं बल्कि एक छोटा भाई या बेटे की सिथिति में था जो अपना अलग घर बनाने जा रहा हो । दो भाई जब अलग हो रहे हो तो मा बाप दोनो भाइयों की सुख सुविधा का ध्यान रखेंगे या उसे दुश्मन मान लेंगे ?

इसी प्रकार सावरकर का मामला भी है सावरकर की ज़िन्दगी को दो भागों में बांटा जा सकता है माफी मांगने से पहले एवं माफी मांगने के बाद । माफी मांगने की घटना को एक मित्र ने कूटनीति के तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया ताकि जेल में रहने की बजाए बाहर आकर आजादी के लिए काम किया जा सके परंतु मित्र इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए की बाहर आकर सावरकर ने क्या काम किया । मेरी जानकारी में सावरकर का कोई भी ऐसा काम नहीं है जो माफी नामे के बाद किया गया हो बल्कि सावरकर का नाम गांधी की हत्या में अवश्य ही संदिग्ध रहा

हम सब भेड है और हमे हांकने का काम कोई नया नहीं है हमेशा कोई न कोई हांकता है और ऐसा सिर्फ गांधी नेहरू पटेल के विषय में ही नहीं बल्कि साधारण घटनाओं के संबंध में भी होता है इसके दो उद्धरण गिनवाए जा सकते है पहला उद्धरण निर्भया कांड से संबंधित है जिसमे घटना कर्म को लेकर इस हद तक आवाज़ बुलंद करवा दी गयी (आवाज़ बुलंद करवा दी गयी ऐसा इसीलिए कहना पड़ा क्योंकि आंदोलन में जो पैसा खर्च हो रहा था वह करोड़ों रुपये विदेश से NGO के माध्यम से आ रहे था) और जनता में से शायद ही नतीज़ों के विषय में किसी ने सोचा निर्भया से पहले भी भारतीय कानून सज़ा देने में सक्षम था परंतु बदलाव के पश्चात रेप कानून सज़ा देने का माध्यम न रहकर बिज़नेस मॉडल बन कर रह गया इसके लिए ज्यादा मेहनत की नहीं सिर्फ न्यूज़पेपर पड़ने एवं NCRB की रिपोर्ट ध्यान से देखने की जरूरत है रेप के मुकदमे लगभग 75% तक वास्तविक रेप न होकर ब्लैकमेल का साधन अथवा बदले की कारवाही मात्र है एवं हर हफ्ते काम से काम 1 ऐसा गिरोह पकड़ा जा रहा है जिसका काम ही रेप कानून का इस्तेमाल करके ब्लैकमेल करना है

हैदराबाद एनकाउंटर दूसरा उद्धरण दिया जा सकता है पुलिस ने 4 युवकों को पकड़ लिया और जनता ने उन्हें दोषी मां लिया और मज़े की बात है की यह वही पुलिस है जिसे अधिकांश लोग वर्दी में गुंडे के रूप में देखते हैं इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण है की समाज को इस तरह से हाँका जा रहा है जिसमे की बेशक पूरे के पूरे शहर जला दिए जाएं किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा परंतु रेप की एक छोटी सी घटना और किसी न किसी को फांसी पर देखना चाहती है जनता

हाल ही में मित्र ने मेरे विचार निर्भया कांड के दोषियों को फांसी की सज़ा पर यह कहते हुए मांगे की में तो महिला विरोधी हूँ तो निर्भय कांड के दोषियों की फांसी के बारे में क्या कहना चाहूंगा । जाहिर है मित्र मुझे भी अपने साथ उसी लाइन में देखना चाहते है जहां वो खुद हाँके जा रहे है । परंतु मेरा जवाब स्पस्ट है की निर्भय कांड में 1 हत्या हुई है जबकि 42 हत्या करने वाले दोषी अभी तक फांसी पर नहीं चढ़ाये गए है इसीलिए फांसी के फंदे पर सबसे पहला हक किसी का है तो वो उन दो बहनों का है जिनको 42 हत्याओं में दोषी पाया गया और फांसी की सज़ा सुनाई गई । और यह हत्याकांड निर्भय से कई साल पहले का है

निर्भया कांड के हत्यारों को फांसी की सज़ा सुनाई गयी है उन्हें फांसी होगी आज नहीं तो अगले साल और यही सज़ा 42 हत्या करने वाली महिलाओं को भी सुनाई गयी है परंतु यदि मुझे निर्भया कांड में फांसी मिलने से खुशी और दूसरे मामले में कोई उत्सुकता नहीं है तो जाहिर है की में निष्पक्ष नहीं हूँ सिर्फ भेद की तरह हाँका जा रहा हूँ और मुझे यह स्वीकार नहीं मुझे भेड बनना स्वीकार नहीं

मुमकिन है चारों तरफ भेड़ें ही भेड हो परंतु इसका मतलब यह नहीं की हम भी भेड बन जाएं