Keshav & Sharma 085 – Single Parenting

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Keshav & Sharma 085

(Single Parenting)

 

 

शर्मा : नमस्कार केशव जी

केशव : नमस्कार शर्मा जी

शर्मा : आइये कुछ देर हमारे पास भी बैठिये

केशव : शर्मा जी सुबह का टाइम पार्क मैं घूमने आये है बैठने नहीं बातें करने की इच्छा हो तो चलते चलते करते है

शर्मा : केशव जी घूमने का काम तो रोज ही करते है कभी कभी किसी के दुःख तकलीफ़ मैं शामिल होना चाहिए

केशव : चलिए आपकी बात ही बड़ी सही (बैठते हुए) बताइये क्या दुःख तकलीफ़ है

शर्मा : इनसे मिलिए केशव जी यह ममता जी है

केशव : नमस्कार ममता जी

शर्मा : शायद आप इनसे परिचित नहीं है यह हमारे मोहल्ले मैं ही रहती हैं

केशव : मेरा ममता जी से उतना ही परिचय है जितना की मोहल्ले के अन्य लोगों से है

केशव : वैसे आप किसी तकलीफ़ की बात कर रहे थे

शर्मा : हाँ केशव जी ममता जी के एक ही बेटा था जो इनको छोड़ कर चला गया

केशव : बहुत बुरा हुआ

शर्मा : इन्होने अपने बेटे को बहुत तकलीफों से पाला था और आज वह इनको अकेला छोड़ कर चला गया

केशव : शायद हमारे मोहल्ले मैं जो एक गोरा सा लड़का अक्सर चुपचाप सा दिखाई देता था किसी से ज्यादा बात नहीं करता था आप उसी की बात कर रहे है न

शर्मा  : जी हाँ वही ममता जी का लड़का था

केशव : वह तो काफी बड़ा लड़का था शायद 20  साल के आस  पास

ममता : जी है अभी २० साल पुरे हुए ही थे

केशव : २० साल की उम्र कम नहीं होती  और लड़का दिखने मैं भी समझदार लगता था

ममता : जी हाँ बहुत ही समझदार लड़का था

केशव : तो दिक्कत क्या थी जहाँ भी गया होगा सोच समझ कर ही तो गया होगा और फिर आखिर तो बच्चों को घर से जाना हो होता है

ममता : नहीं केशव जी लड़के को बहकाकर मुझसे छीन लिया

केशव : ऐसे भला कौन छीन सकता है

ममता : लड़के का बाप उसे बहका कर ले गया है

केशव : भला लड़के के पिता को ऐसा करने की क्या जरूरत थी वह तो जब चाहे लड़के से मिल सकता था

शर्मा : नहीं केशव जी ऐसा नहीं था | दरअसल इनका अपने पति से झगड़ा चल रहा था और ममता जी नहीं चाहती थी की बच्चे पर उसके बाप का प्रभाव पड़े इसीलिए बच्चे को लेकर यहाँ चली आयी थी

केशव : शर्मा जी बाप नहीं पिता होता है |

केशव : क्या बच्चे के पिता ने तलाश करने और मिलने का प्रयास नहीं किया

शर्मा : कर रहे थे लगातार करते रहे है पिछले 15  सालों से लगभग हर रोज फ़ोन किया करते थे रविवार को तो यहाँ आया भी करते थे | घर पर नहीं मिल सकते थे इसीलिए बहार पार्क मैं बैठे इंतज़ार करते रहते थे बच्चे के बाहर  आने का |

केशव : और

शर्मा : इस मामले पर एक दो बार पीट भी गए फिर भी नहीं माने और कोर्ट मैं विसिटेशन एवं कस्टडी के लिए केस तो चल ही रहा था |

केशव : तो केस का क्या रहा

शर्मा : कुछ नहीं ममता जी कोर्ट मैं हाज़िर ही नहीं हुई और न बच्चे को हाज़िर किया | कभी मजबूरी आ गयी तो अपने त्रिपाठी जी ने मेडिकल सर्टिफ़िकेट बना दिया | इस तरह से 15 साल से केस लटका रखा है |

केशव : और खर्चा कैसे चलता था

ममता : खर्च तो  कोर्ट ने बांध रखा था और हर महीने की एक तारीख को बैंक मैं आ जाता था

केशव : आप खुद क्या काम करती है

ममता : मुझे काम करने की जरूरत नहीं पड़ी मेंटेनेंस मैं अच्छा पैसा मिल जाता था

केशव : तो किस तरह की तकलीफ उठाई आपने बच्चे को पलने मैं

ममता : मतलब क्या है आपका

केशव : मेरा मतलब है की कमाने की जरूरत आपको नहीं पड़ी, घर से बहार आपको नहीं जाना पड़ा तो आखिर किस तकलीफ़ से गुजरना पड़ा आपको

ममता : आपका मतलब है की सिर्फ पैसा से ही बच्चे की परवरिश हो जाती है

केशव : मैं आपसे जानना चाहता हूँ आपने ऐसा क्या किया जिससे की आपको तकलीफ़ हुई हो

ममता : बच्चे को टाइम से खिलाना पिलाना, उसके कपड़े साफ़ करना, उस पर नज़र रखना, बीमारी मैं देखभाल  ……..

केशव : जब बच्चे  को आपने अपने रखा है तो यह सब काम तो सामान्य है इसमें तकलीफ़ कैसी

ममता : आप जानते नहीं है केशव जी कभी कभी तो सारी रात नहीं सोता था रोता  रहता है

केशव : अच्छा

ममता : और मुझे सारी रात जागना पड़ता था

केशव : ऐसा क्यों करता था

ममता : कभी अपने बाप से कभी दादा दादी से मुलाकात करने की ज़िद करता था बहुत तूफ़ान उठा देता था

केशव : आपने ऐसे मोके पर क्या किया

ममता : सच मैं बहुत झुंझलाहट पैदा होती थी | एक बार तो मुझे थप्पड़ मारना पड़ा तब जाकर सोया

केशव : अच्छा परन्तु अगर आप थप्पड़  मरने की बजाये बच्चे  को उसके पिता दादा दादी से मिलवा देती तो ज्यादा उचित होता न

ममता : अरे ऐसे कैसे मिलवा देती बच्चा मेरा था, उसे पालने का काम  मैं कर रही थी , सब तकलीफें मैंने उठाई और आप कहते है की मुझे मुलाकात करवा देनी चाहिए थी |

केशव : बिलकुल करवा देनी चाहिए थी बल्कि बच्चा उसके पिता को सौंप देना चाहिए था इससे आपकी सब तकलीफ़ दूर हो जाती

ममता : बच्चा मेरा था उसे मैंने पैदा किया था

केशव : शर्मा जी आप कुछ कहेंगे या मैं कहूँ

शर्मा : मजबूरी है कहना ही पड़ेगा

केशव : तो कहिये

शर्मा : शर्मा जी बच्चा आपका  नहीं आप दोनों का था | उसे सिर्फ आपने पैदा नहीं किआ आप दोनों ने पैदा किया

ममता : बच्चे पर मेरा अधिकार था उसे मैंने 9 महीने अपनी कोख मैं पाला  था

शर्मा : नहीं ममता जी जहाँ तक बच्चे को अपनी कोख मैं रखने से वह आपकी सम्पति  नहीं बन जाता | कुदरत ने बच्चा आपको ज़िम्मेदारी के तौर पर सौंपा था और वह आपकी ज़िम्मेदारी था उस वक़्त तक  जब तक की बच्चा आपके बिना जिन्दा ही नहीं रह पाए |

ममता : अपने दोस्त को देख कर आपने तो रंग ही बदल लिया

शर्मा : बच्चा आपकी ज़िम्मेदारी था और उसके लिए जो भी तकलीफ़ आपको उठानी पड़ी वह सब आपका कर्तव्य था | ऐसा लगता है की बच्चे के पिता ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का हर संभव प्रयास किया है |

ममता : और मैंने

शर्मा : शायद आपने बच्चे को अपनी सम्पति के तौर पर बड़ा किया इसीलिए शायद आपने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई | शायद इसीलिए बच्चा आपको छोड़ कर अपने पिता के पास चला गया |

ममता : हां क्यों नहीं आप मर्द है अपनी जात का ही पक्ष लेंगे

शर्मा : नहीं ममता जी इसमें जात की बात नहीं है बस सचाई को आप स्वीकार नहीं कर रही | सच यह है की आपने तकलीफ़ उठाई बच्चे को उसके पिता से दूर रखने के प्रयास मैं | मुमकिन है आपने अपनी बाकि जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाया हो परन्तु यह एकमात्र प्रयास आपने लिए भरी पढ़ रहा है |

ममता : सब मर्द एक जैसे ही होते है

शर्मा : चलिए केशव जी ममता जी को हमारी आवश्यकता नहीं है हम अपना वक़्त क्यों बर्बाद करें | ममता जी को तसल्ली देने वाली महिला मंडली भी आती ही होगी

केशव : बिलकुल चलिए हम रोज की तरह पार्क के 4 चक्कर लगाएंगे और फिर मेरे घर चल कर दूध कर बड़ा गिलास शर्त लगाकर पिएंगे

शर्मा : चलिए। … …. … और आज शर्त मैं ही जीतूंगा

केशव : देखते  है

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