आजाद परिंदा – बुजुर्ग

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आजाद परिंदा – बुजुर्ग

 

हरनाम सिंह अपने समय पर ठीक आठ बजे इंदिरा पार्क में दाखिल हुए जहाँ उनको अपने नियमित कार्यक्रम के अनुसार पार्क के चारों तरफ बनी हुई पट्टी पर पुरे पांच किलोमीटर यानि की पांच चक्कर घूमना था । हर रोज़ की तरह उन्होंने प्रसन्नचित मन से चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो दूसरे सिरे पर एक कोने में अमरजीत सिंह एक रेहड़ी वाले के साथ बातें कर रहे थे । अमरजीत सिंह का इस वक़्त दिखाई देना हरनाम सिंह के लिए बड़ा अचरज था । अमरजीत सिंह भी हर रोज इंदिरा पार्क में घूमने आते थे परन्तु वह 7 बजे ही वापिस लौट जाते थे आज 8 बजे तक भी उनका यहाँ होना अचरज की बात थी । हरनाम सिंह धीरे धीरे घुमते हुए अमरजीत सिंह के पीछे पहुँच गए । अमरजीत सिंह के हाथ मिटटी में सने हुए थे और देखने से ही लगता था की वह कुछ मजदूरी जैसा काम कर रहे थे । चारो तरफ देखने पर पता चला की ईंटों की मदद से एक चबूतरा बनाया जा रहा था ।

अमरजीत “: मेरे विचार से काम पूरा हो गया ”

युवक : “थोड़ा और ऊँचा होना चाहिए इसिलिटे 1 जोड़ी ईंट और लगा देतेहैं”

अमरजीत : “ज्यादा ऊँचा हो जायेगा तो ग्राहकों को प्लेट पकड़ाना आसान नहीं होगा”

युवक :” अरे आप भूल गए आपने ही तो प्लेट पकड़ाने के लिए ठेले में निचे एक खिड़की रखवाई थी ”

अमरजीत :” अरे हाँ में बिलकुल भूल गया था”

युवक : “तो एक एक ईंट और लगा दे ”

अमरजीत :” हां लगा दो । वैसे बिल पूरा चूका दिया ना पैसा कम तो नहीं पड़ा ।”

युवक : “अरे नहीं बल्कि 2000 के करीब बच गया है वह आपको लौटने के लिए लाया हूँ । ”

अमरजीत : “पहले काम धंधा जमा लो फिर लौटा देना ”

बातचीत शायद आगे भी होती तभी अमरजीत सिंह की नज़र हरनाम सिंह पर पड़ी और वह हरनाम सिंह की तरफ बढ़ आये । और फिर दोनों दोस्त नल की तरफ चले गए जहाँ पर अमरजीत सिंह ने अपने हाथ साफ़ किये और फिर दोनों दोस्त नज़दीकी ढाबे से चाय लेकर पीने लगे ।

पिछले कई दिन से दोस्तों में अफवाह थी की अमरजीत सिंह ने एक नवयुवक को कई हज़ार की आर्थिक मदद की है । हालाकि अब से पहले तक यह सिर्फ अफवाह के रूप में कहा जाता था, किसी को पता नहीं था कितनी मदद की कुछ लोग हज़ारों कह रहे थे और कुछ लाखों भी कह रहे थे, यहाँ तक की किसी को पता नहीं था की किसकी मदद की बस इतना ही कहा जाता था की नवयुवक किसी गाओं से आया था और पार्क के आस पास भीख मांगते देखा गया था । परन्तु अभी अभी हरनाम सिंह को पता चला की अमरजीत सिंह ने युवक की मदद की ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके और मदद भी काफी बड़ी की है । हरनाम सिंह अमरजीत सिंह से काफी कुछ जानना चाहते थे परन्तु उनको पता था की अमरजीत सिंह इस बारे में बातचीत पसंद नहीं करेंगे इसीलिए हरनाम सिंह बातचीत को इस दिशा की तरफ नहीं लाये ।

अमरजीत सिंह 62 वर्षीय रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी है । उन्हें हर रोज सुबह 5 बजे से लेकर 7 बजे तक इंदिरा पार्क में घुमते हुए देखा जा सकता है । सावन के महीने में जब आसमान काली घटाओं से घिरा होता है और किसी भी समय पानी बरसने के आसार दिखाई दे रहे हो और अधिकांश व्यक्ति अपने घरो से निकलने से पहले आसमान की तरफ देखने के बाद निकलना स्थगित कर रहे हो उस वक़्त भी अमरजीत सिंह इंदिरा पार्क में अपने 2 घंटे की नियमित घुमाई के लिए आते है । कई लोग यह तक कह देते है की अमरजीत सिंह को पार्क में आते या पार्क से जाते देख कर अपनी घडी का टाइम सही किया जा सकता है । वैसे यह सिर्फ कहने की बात है वरना कई दफा अमरजीत सिंह लेट या कई बार जल्दी भी आ जाते है । सच्चाई सिर्फ इतनी है की अमरजीत सिंह इंदिरा पार्क में आते है और दो घंटे की नियमित घुमाई अवश्य करते है । इन दो घंटो में जॉगिंग के साथ साथ हल्की एक्सरसाइज और योगा भी करते है । भारी भरकम एक्सरसाइज करना अमरजीत सिंह को कभी पसंद नहीं था और आज भी नहीं है ।

यही नियमित तरीका है अमरजीत सिंह के दिन शुरू करने का । ऐसा नहीं है की अमरजीत सिंह अकेले ही पार्क में घूमने जाते हो । हर रोज सुबह इंदिरा पार्क बच्चे, बूढ़े और जवानो के दिन शुरू करने का पसंदीदा स्थान है । अमरजीत सिंह के इंदिरा पार्क जाने और उनके पडोसी नरोत्तम गुप्ता के पार्क जाने का समय लगभग एक ही है । कई दफा दोनों अपने घरों से निकलते है और फिर रास्ते में मुलाकात होती है और फिर इकठे ही पार्क तक जाते है परन्तु जैसे ही पार्क के अंदर दाखिल हुए दोनों की अपनी अपनी दुनिया है । जहाँ अमरजीत सिंह पार्क में आते ही धीमे धीमे चलना शुरू करते है वही गुप्ता जी अपने हमउम्र दोस्तों के ग्रुप में शामिल हो जाते है जहां अगले 30 और कभी 40 मिनट तक दुःख सुख साँझा करने का नियम है । इन्ही 30-40 मिनटों में अमरजीत सिंह लगभग 5 किलोमीटर का चक्कर लगा लेते है । उसके बाद वह गुप्ता जी के पास आते है यहाँ उनकी अपने हमउम्र लोगों से नमस्कार के साथ साथ गुप्ता जी के उठने के लिए संकेत भी रहता है । इसके बाद दोनों पार्क का एक या कभी दो छोटे चक्कर और लगते है । दो चक्कर के बाद गुप्ता जी अक्सर जवारे के जूस देख कर ललचा जाते है और एक बार फिर 20-25 मिनट बैठने का प्रोग्राम बन जाता है, यहाँ भी अमरजीत सिंह ज्वारे के जूस पर नहीं रुकते और एक बार फिर अकेले आगे बढ़ जाते है और 20-25 मिनट तक योगा करने के बाद फिर एक बार गुप्ता जी को उठने कर संकेत करते है और उनको लेकर आगे बढ़ जाते है ।

अगला 1 घंटा अमरजीत सिंह इंदिरा पार्क के एक कोने में बनी फूलों की क्यारी में या दूसरे कोने पर बनी पक्षियों के ठिकाने या तीसरे कोने में बने बच्चों के झूले में या चौथे कोने में बनी झील के आसपास गुजरता है । यह 60 मिनट अमरजीत सिंह क्या करेंगे यह पहले से तय नहीं होता जैसा उनका मूड हो वैसा ही वह करते है । परन्तु अमरजीत सिंह को आज तक कभी किसी ने अपने हमउम्र लोगों में बैठ कर गप्पें लगते नहीं देखा ।

क्या इसका अर्थ है की अमरजीत सिंह अपने हमउम्र लोगों में बैठना पसंद नहीं करते ?

यह सच नहीं है अमरजीत सिंह पार्क में आने वाले हर व्यक्ति से परिचित है और हर किसी से उनके अच्छे सम्बन्ध है बस किसी के साथ बैठ कर गप्पे लड़ना उनके स्वाभाव में नहीं है । यहाँ तक की यदि उनके पास समय हो तो वह गप्पें लड़ने की बजाये ऐसा कुछ करना पसंद करेंगे जिसमे उनकी रूचि हो ।

यह शायद कुछ साल पहले की घटना है जब अमरजीत सिंह रिटायर हुए ही थे और शायद पहली बार ही पार्क में आये थे । उस दिन गुप्ता जी और अमरजीत सिंह साथ साथ ही पार्क में आये और आते ही अपने हमउम्र लोगों के साथ बैठ गए । दोनों ने सबको नमस्कार की और उनकी चलती हुई बातचीत में शामिल हो गए ।

विष्णु : “आज मुझे भठिंडा जाना है वहां से कपड़ों के थान उठा कर लाने है ”

अमरजीत :” अरे विष्णु जी दुकान तो आपके लड़के सम्हालते है ना तो वह ले आएंगे ”

विष्णु : “हां दुकान तो लड़के ही सम्हालते है परन्तु भागदौड़ तो मुझे भी करनी पड़ती है ”

हिम्मत :” भागदौड़ तो करनी ही पड़ती है अब मुझे ही देखो हर हफ्ते दिल्ली जाता हूँ सामान खरीदकर ट्रक में लोड करवाने तक वही रहना पड़ता है और ट्रक के साथ ही लौटना पड़ता है पता नहीं कब ट्रक ड्राइवर गड़बड़ कर दे या पुलिस वाले कुछ पंगा कर दे । अपनी निगरानी में ले आता हूँ वरना मेरी उम्र तो है नहीं की ट्रक में सफर किया जाये । ”

अमरजीत :” हिम्मत जी आपकी उम्र ट्रक का सफर करने की नहीं है आप लड़के को दिल्ली भिजवाया कीजिये और जरूरत हो तो खुद दुकान सम्हालिए

हिम्मत : “लड़का सब डूबा देगा इसीलिए हर तरफ नज़र रखनी पड़ती है ”

अमरजीत : “आपका लड़का समझदार है बिज़नेस सम्हालना जानता है ”

हिम्मत :” हां समझदार तो है फिर भी जब तक सांस चल रही है तब तक तो नज़र रखनी ही पड़ेगी ”

अमरजीत : “वैसे आपने PM का भाषण सुना क्या विचार है क्या पाकिस्तान के साथ जंग होगी ”

नारंग :” कौन जाने हो ही जाये परन्तु हमें क्या हमें तो अपना घर से ही फुर्सत न मिलती ”

अमरजीत :” नारंग जी आपकी उम्र 80 के आसपास है आप अपना घर लड़के लड़की को सम्हाल कर कुछ वक़्त अपने लिए निकालिये ‘

नारंग : “ऐसा ना होता अमरजीत जब तक सांस चलेगी घर को तो हम ही चलाएंगे हमारे बाद लड़का लड़की जाने ‘”

नवजोत : “आपके मजे है नारंग जी अपने जोर पर घर चला रहे है वरना यहाँ तो लड़के लड़की अपनी मर्जी करते है हमसे तो पूछते ही नहीं । हमारी राय की तो कोई अहमियत ही नहीं । यदि कोई राय दे भी दो तो कोई ध्यान नहीं देता”

अमरजीत : “नवजोत जी आपकी उम्र 95 के ऊपर है अब आप आराम कीजिए अपनी राय क्यों देना चाहते है । आपके बच्चे है सम्हाल लेते है सब आगे भी सम्हालेंगे । ”

नवजोत : “अरे अमरजीत मुझे 95 साल का अनुभव है और बच्चों को अभी दुनिया का कुछ पता नहीं ।”

अमरजीत :” अरे आपके बच्चों को भी तो 65-70 साल का अनुभव है”

नवजोत : “तो उससे क्या हम बेकार हो गए ”

अमरजीत :” ऐसा तो नहीं है ”

और इस प्रकार अगले 60 मिनट तक कई तरह की बातें होती रही जिससे अमरजीत सिंह सिर्फ एक ही निष्कर्ष निकाल सके की यहाँ मौजूद लोग बेशक उम्रदराज़ है और स्वयं को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कहते है परन्तु वास्तव में यह सब लोग रिटायर नहीं हुए है । इन सबको अपने घरों पर होने वाली हर रोज की समस्याओं में अधिक दिलचस्पी है और वह लोग चाहते है की समस्याओं को वह ही सुलझाएं । सबके घरों में समस्याएं है और समस्याओं को सुलझाने के लिए लोग मौजूद है परन्तु जिनके साथ इस वक़्त अमरजीत सिंह बातचीत कर रहे थे वह लोग स्वयं समस्याओं को सुलझाना चाहते थे । शायद इसी सुलझाने में ही उनको अपनी उपयोगिता दिखाई देती हो । यह संभव है की इन लोगों के लिए घर में अपना महत्व बनाये रखने का यही एकमात्र तरीका हो इसीलिए इनकी दिलचस्पी समस्या तलाश करने और उसको सुलझाने में ही हो । परन्तु अमरजीत सिंह इस विचारधारा के व्यक्ति नहीं थे उन्होंने अपने वक़्त में पूरा घर अपने दम पर सम्हाला था और अब वह अपनी तरफ से किसी भी भूमिका के लिए तैयार नहीं थे । अमरजीत सिंह अब सिर्फ अपने लिए ही कुछ करना चाहते थे वह बुजुर्ग की भूमिका में भी नहीं आना चाहते थे उनकी नज़र में वह बुजुर्ग की भूमिका पहले ही निभा चुके है । उन्होंने अपने बच्चों को उनके पैरों पर खड़े कर दिया है और अब अमरजीत सिंह खुद को आजाद समझते है और वह आजाद ही जीना चाहते है । इसीलिए अमरजीत सिंह ने समझ लिया की उनकी दिनचर्या इन बुड्ढे लोगों के साथ नहीं जम सकती और इन सबसे अलग अमरजीत सिंह ने अपनी दिनचर्या व्यवस्थित कर की इसी व्यवस्था में अमरजीत सिंह सबके साथ मेलजोल रखते है परन्तु इनके साथ बैठ कर गप्पें लड़ना उन्हें पसंद नहीं ।

अमरजीत सिंह के सुबह के 2 घंटे जितना व्यवस्थित है उनका बाकी का दिन भी उतना ही व्यवस्थित है । बेशक किसी और को पता न हो परन्तु अमरजीत सिंह को अवश्य पता होता है की वह किस वक़्त कहाँ होंगे और क्या कर रहे होंगे । अमरजीत सिंह की पत्नी हरबंस कौर बिलकुल विपरीत प्रकृति की महिला है । किसी और की तो कहा ही क्या जाये उनको स्वयं को भी पता नहीं होता की वह किस वक़्त कहाँ होगी और क्या कर रही होंगी । परन्तु हरबंस कौर अमरजीत सिंह के लिए समस्या नहीं है । ऐसा नहीं है की दोनों में तू तू मैं मैं नहीं होती , लगभग रोज ही होती है परन्तु अमरजीत सिंह के लिए वह सिर्फ एक वक़्ती घटना मात्र है जो उनकी पुरे दिन पर कोई प्रभाव नहीं डालती । एक दिन की बात है अमरजीत सिंह पार्क से घूम कर वापिस लोटे ही थे और चाहते थे की उनको गरमा गरम चाय का एक कप मिल जाये । अमरजीत सिंह ने अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई परन्तु कहीं से कोई जवाब नहीं आया । थोड़ी देर बाद फिर आवाज़ लगाई फिर कोई जवाब नहीं आया तब अमरजीत सिंह स्वयं घर के अंदर गए और हर कमरे में हरबंस कौर को तलाश किया परन्तु हरबंस कौर मौजूद नहीं थी । अमरजीत सिंह ने स्वयं ही चाय बनाई और गुनगुनी धुप में बैठ गए । लगभग एक घंटे बाद हरबंस कौर बाहर से लोटी ।

हरबंस : “पार्क से जल्दी लौट आये ”

अमरजीत :” जल्दी कहाँ 9 बजने वाले है ‘

हरबंस : “अच्छा मुझे टाइम का पता ही नहीं चला”

अमरजीत : “हर रोज सुबह सुबह चली जाती हो मैंने पार्क चलने को कहा था तब मना कर दिया था । कल से मेरे साथ पार्क में चलना । ”

हरबंस : “नहीं मुझे गुरूद्वारे जाना होता है ‘

अमरजीत :” गुरूद्वारे की तरफ से निकल जाया करेंगे 10 मिनट गुरूद्वारे में रुक कर उसके बाद पार्क जाया करेंगे ‘

हरबंस : “नहीं गुरूद्वारे के बाद मुझे सुखबीर के पास जाना होता है ”

अमरजीत : “वहां हर रोज जाना जरूरी नहीं है और जाना ही हो तो दोपहर में जाया करो ‘

हरबंस :” दोपहर में मेरा वहां क्या काम इस वक़्त खाना बनाने में मदद कर देती हूँ । बच्चों को स्कूल जाना होता है कुछ हाथ बटा देती हूँ । ”

अमरजीत :” वह सब तुम्हारा काम नहीं है सुखबीर का काम है वह खुद देख लेगी यदि जरूरत होगी तो कोई नौकर रख लेगी ।’

हरबंस : “नौकर क्यों रखेगी में क्या मर गयी हूँ ।’

अमरजीत : “तुमने अपने वक़्त में काम कर लिया अब बच्चों का वक़्त है उनको करने दो और तुम खुद अपने लिए जीओ । कुछ ऐसा करो जिसमे किसी के हानि लाभ की बजाये अपनी ख़ुशी महसूस होती हो “।

हरबंस : “मुझे सुखबीर की मदद करने में ही ख़ुशी महसूस होती है”

और बहस काफी लम्बी चली परन्तु आखिर में अमरजीत सिंह समझ गए की अभी हरबंस कौर रिटायर नहीं हुई है और उनका रिटायर होना का इरादा भी नहीं है । इसीलिए दोबारा अमरजीत सिंह ने हरबंस कौर को अपने साथ पार्क चलने के लिए नहीं कहा और ना ही उसे समझने की कोशिश की । इस छोटी सी झड़प के कारण अमरजीत सिंह पर कोई विशेष अंतर नहीं पड़ा बस उन्होंने अपनी दिनचर्या में हरबंस कौर की अनिवार्यता को हटा दिया ।

इस घटना के काफी दिन बाद एक अन्य घटना घटी जिसने एक बार फिर अमरजीत सिंह और हरबंस कौर को आमने सामने ला दिया । वैसे घटना कोई विशेष नहीं थी परन्तु हरबंस कौर की नज़र में बहुत बड़ी घटना थी इसीलिए अमरजीत सिंह की हरबंस कौर के साथ झड़प भी हुई और शायद अगले कुछ दिन घर का माहौल तनावपूर्ण भी रहा परन्तु अमरजीत सिंह अपनी दिनचर्या बिना किसी बदलाव के निभाते रहे । हुआ कुछ इस प्रकार था की अमरजीत सिंह के घर के पास ही एक हॉस्पिटल भी था और हॉस्पिटल में ख़ुशी और गम का आना जाना तो आम बात ही है । जब अमरजीत सिंह पार्क से लौट रहे थे तो उन्होंने हॉस्पिटल के बाहर एक महिला को बैठे देखा जो काफी उद्दास लग रही थी और ठण्ड से काँप भी रही थी । अमरजीत सिंह घर आये और उन्होंने 3-4 कप चाय बनाने को कहा, जब देखा की हरबंस कौर अन्य जगह व्यस्त है तो स्वयं ही चाय बना कर ले गए और उस महिला को चाय पिलाई, महिला के साथ छोटे बच्चे भी थे जिनको वास्तव में चाय की आवशयकता था । उसके बाद उन्होंने महिला एवं बच्चों को नाश्ता भी करवाया । अमरजीत सिंह काफी देर तक महिला के पास बैठे रहे और उसका दुःख सुख सुनते रहे । यहां तक तो हरबंस कौर को कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु हरबंस कौर की तरफ से जबरदस्त आपत्ति उठाई गयी जब अमरजीत सिंह ने उस महिला की आर्थिक मदद करने के लिए दो हज़ार रूपये उसे दिए । जैसे ही हरबंस कौर को पता चला की अमरजीत सिंह ने दो हज़ार रुपये किसी को दे दिए है तो हरबंस कौर का दिमागी पारा बहुत ऊपर चला गया और उन्होंने अमरजीत सिंह को बहुत खरी खोटी सुना दी । अमरजीत सिंह ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया परन्तु कब तक आखिर अमरजीत सिंह भी भड़क गए ।

अमरजीत : “क्या पिछले आधे घंटे से बकवास किये जा रही हो ”

हरबंस : “तुम पैसे उड़ाते रहो और में रोकू तो वह बकवास हो गयी ”

अमरजीत : “कौनसा खज़ाना लुटा दिया मैंने सिर्फ 2000 दिए है दवाइयों के लिए”

हरबंस : “2000 कम है क्या ”

अमरजीत : “तुम्हारे खर्चे में से काट कर कुछ नहीं दिया मेरे बैंक में से दिए है जोकि मेरी मेहनत की कमाई है”

हरबंस :” मेरे खर्चे से क्या मतलब हुआ यदि बैंक में दो पैसे पड़े है तो उड़ा देने के लिए नहीं है अपने बच्चों के लिए छोड़ कर जाने है ”

अमरजीत :” दोनों बच्चे पूरी तरह सेट है और मेरी तरफ से उनको जो मिलना था मिल चुका है”

हरबंस :”तुम्हारा तो दिमाग ख़राब हो गया है तुम्हारा बस चले तो यह मकान भी किसी को दान दे दो ”

अमरजीत :” हां बिल्कुल दे सकता हूँ इसे मैंने अपनी मेहनत से बनाया है और में जिसे चाहूँ दे सकता हूँ । वैसे मेरी इच्छा है की इसे लाइब्रेरी बना दिया जाये ”

हरबंस : “बना कर देखो में तुम्हे बच्चों का मकान / प्रॉपर्टी उजाड़ने नहीं दूँगी”

अमरजीत : य”ह बच्चों की नहीं मेरी है ‘

हरबंस : “हिम्मत हो तो हाथ लगा कर दिखाओ मकान को ”

और फिर उस दिन अमरजीत और हरबंस में बहुत देर तक झड़प हुई । हरबंस कौर की नज़र में अमरजीत सिंह पैसा लुटा रहे थे और वह किसी भी कीमत पर बच्चों का पैसा बर्बाद नहीं होने देने के लिए दृढ़ संकल्प थी । और अमरजीत सिंह उनकी नज़र में वह अपने आखिरी समय को अपने हिसाब से जी रहे थे । और बच्चे ?

अमरजीत सिंह के दो लड़के भी है दोनों अपने अपने कारोबार में व्यस्त । बड़ा लड़का लकड़ी का कारीगर है और उसका अपना वर्कशॉप एवं शोरूम है । वहीँ छोटे लड़के को गाड़ियों की मरम्मत में महारत हासिल है उसका अपना सर्विस सेण्टर है । दोनों को अपने पैरों पर खड़े होने में अमरजीत सिंह ने पूरा सहयोग दिया दोनों को पढ़ाया और फिर कारीगरी सीखने के बाद दोनों को कारोबार शुरू करने के लिए कुछ पूंजी भी दी और साथ ही बैंक से लोन दिलवाने में भी काफी भागदौड़ की ।

अमरजीत सिंह का अपना मकान है जो उन्होंने अपनी जॉब के दौरान ही बनवा लिया था । इसी मकान में ही उन्होंने अपना पूरा जीवन निकल दिया और यही वह मकान है जहाँ पर दोनों लड़के बड़े हुए । जब बड़े लड़के पढ़ाई समाप्त हुई और उसे किसी काम धंधे में लगाने की बात आई तब अमरजीत सिंह ने उसके शोंक यानि की लकड़ी की कारीगरी को ही उसका व्यवसाय बनाने का निर्णय किया और लड़के के सामने प्रस्ताव रख दिया । जब लड़का अपने पिता के प्रस्ताव से सहमत हुआ तब अमरजीत सिंह ने लड़के को अपने कुछ मित्रों के पास भिजवाया और उसे लकड़ी के कारोबार के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए आजाद कर दिया । लड़के ने पूरी मेहनत की और लगभग दस महीने तक लड़के का घर पर संपर्क बना रहा परन्तु, लड़का घर पर नहीं आया बल्कि वह एक कारखाने से दूसरे कारखाने और फिर नए शहर और कारोबार के नए नए गुर सीखता रहा । और जब 10 महीने बाद लड़का घर आया तब तक अमरजीत सिंह की पत्नी लड़के की चिंता करते करते आधी रह गयी थी और अमरजीत सिंह उन्हें चिंता नहीं थी, वह सिर्फ लड़के की गतिविधियों पर दूर से नज़र रखे हुए थे और लड़का जब घर लौटा तब बेशक स्वास्थ्य के हिसाब से थोड़ा कमजोर दिख रहा था परन्तु व्यावसायिक बुद्धि के मामले में बहुत आगे निकल चूका था ।

और फिर एक दिन लड़के ने लकड़ी का कारोबार शुरू कर दिया । लड़के की माँ ने कई कारणों से बहुत विरोध किया परन्तु कारोबार शुरू हो ही गया । और आज बड़ा लड़का अपने कारोबार में सफल है ।

अमरजीत सिंह अक्सर शाम को इंदिरा पार्क में जाकर बैठते थे । सुबह की तरह घूमने का या योग आदि का प्रोग्राम नहीं होता था परन्तु अक्सर अमरजीत सिंह पार्क में बैठ कर अपना वक़्त बिताया करते थे । इसी वक़्त अक्सर अमरजीत सिंह के दोनों लड़के भी आ जाया करते थे । लड़के हर रोज तो नहीं आ पाते थे परन्तु हफ्ते में 2 बार मिलने आ ही जाते थे । कुछ समय बिता कर दोनी अमरजीत के साथ ही घर आते और हरबंस के पास कुछ वक़्त बिता कर फिर अपने अपने घर चले जाते । एक रोज सुबह अमरजीत सिंह पार्क में घूम रहे थे तब मनोहर जी से उनको पता चला की अमरजीत का बड़ा लड़का किसी किस्म की आर्थिक परेशानी में है । सयोंग की बात थी की उसी शाम जब अमरजीत सिंह पार्क में बैठे थे तब बड़ा लड़का भी मिलने आ गया । दोनों बाप-बेटा तकरीबन एक घंटा पार्क में बैठे रहे परन्तु ना तो अमरजीत सिंह ने लड़के से उसकी आर्थिक परेशानी के बारे में पूछा और ना ही लड़के ने खुद बताया । और फिर दोनों घर आ गए और अपनी माँ से मिलने के बाद लड़का अपने घर चला गया ।

तो क्या इसका अर्थ यह है की अमरजीत अपने लड़कों के मामलों तकलीफों में कोई दिलचस्पी नहीं रखते ?

ऐसा नहीं है एक घटना और घटी । जिस दिन अमरजीत सिंह अपने लड़के से पार्क में मिले थे उसके तकरीबन एक महीने बाद लड़का अमरजीत सिंह के पास आया और उसने अपनी परेशानी का जिक्कर अमरजीत सिंह से किया और उसकी राय जाननी चाही । उस दिन अमरजीत सिंह लगभग दो घंटे तक अपने लड़के से विचार विमर्श करते रहे उन्होंने अपनी दिनचर्या को भी छोड़ दिया परन्तु हर संभव प्रयास किया जिससे की लड़के की परेशानी दूर कर सकें ।

मामला सिर्फ इतना है की उन्होंने अपने लड़कों को काबिल बनाने के लिए वह सब किया जो वह कर सकते थे और अब उन्हें उनकी क़ाबलियत के साथ अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए खुला छोड़ दिया है । अमरजीत सिंह को शिकायत नहीं है की उनके लड़के उनकी बात नहीं सुनते या मानते उन्हें मालूम है की उनके लड़के समर्थ है और अपनी समस्याओं का हल निकल सकते है यदि कभी आवशकता होगी तब वह खुद चल कर अमरजीत सिंह के पास आ जायेंगे । अमरजीत सिंह यह जरूरी नहीं समझते की वह अपना अनुभव अपने लड़को को जबरदस्ती बताते रहें ।

अमरजीत सिंह ने अपने छोटे लड़के पर भी उतनी ही मेहनत की जितनी की बड़े लड़के पर । जब छोटे लड़के की पढाई समाप्त हुई तब एक बार फिर अमरजीत सिंह ने मेहनत की और एक बार फिर उन्होंने लड़के के लिए एक नए व्यवसाय की तलाश की और लड़के को व्यवसाय शुरू करने से पहले बाजार का अध्ययन करने का पूरा अवसर दिया । हरबंस कौर ने एक बार फिर विरोध किया और उसने चाहा की छोटे लड़के को बड़े लड़के के साथ ही कारोबार में लगा दिया जाये । छोटे या बड़े लड़के को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु अमरजीत सिंह ने अपने दिमाग से काम लिया और आज छोटा लड़का अपनी मेहनत और बुद्धी से बढ़िया कारोबार कर रहा है ।

दरअसल मामला शुरू हुआ तकरीबन दो साल पहले जब अमरजीत सिंह अपनी नौकरी से रिटायर हो चुके थे और उनके दोनों लड़के अपने अपने कारोबार में व्यस्त है तब अमरजीत सिंह के सामने सवाल आया की अब उनको क्या करना चाहिए ?

कुछ ऐसी ही परिस्थिति हरबंस कौर की भी है । हरबंस कौर भी लगभग रिटायर ही है और उन्हें भी कोई परेशानी नहीं है तो ऐसे में जो सवाल अमरजीत सिंह के सामने है वही सवाल हरबंस कौर के सामने भी है । हरबंस कौर क्या करे ?

यह एक ऐसा सवाल है जो एक न एक दिन हर व्यक्ति के सामने आता है और इस सवाल का जवाब हर व्यक्ति अपने अपने हिसाब से तलाश करता है । अमरजीत सिंह और हरबंस कौर ने भी वही किया दोनों ने सवाल खुद से पूछा और जवाब भी पा लिया ।

हरबंस कौर ने स्वयं से यही सवाल पूछा तो उनको जवाब मिला की अभी रिटायरमेंट कहाँ आया है और हरबंस कौर व्यस्त हो गयी ।

अमरजीत सिंह ने खुद से सवाल पूछा की उसे रिटायरमेंट के बाद क्या करना चाहिए तो उसे जवाब मिला की कुछ नहीं और अमरजीत सिंह ने इस जवाब को ही अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया और आज़ाद हो गए । अब वह कुछ नहीं करते वह सिर्फ वही करते है जो उनके स्वयं के लिए आवश्यक है । उनके करने में से हानि लाभ खत्म हो चुका है यदि कहीं कुछ हानि लाभ है भी तो वह सिर्फ उनके स्वस्थ तक सीमित है या और अधिक कहा जाये तो उनके आत्मिक आनंद तक सीमित है ।

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