004. एक था गुरु – लाइब्रेरी

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004. एक था गुरु – लाइब्रेरी

अनाम

 

 

वैसे तो गुरु एक ठीक ठाक व्यक्ति है और मेरा उससे परिचय भी बहुत बढ़िया है । मुझे गुरु के साथ वक़्त गुजरना भी अच्छा लगता है लेकिन मेरे घर वालो को गुरु अधिक पसंद नहीं है । यदि उनका बस चले तो वो मुझे गुरु से मुलाकात भी नहीं करने दे । परंतु कारोबारी मजबूरी के कारण मुझे रोक पाना उनके लिए संभव नहीं । यदि कारोबारी मजबूरी नहीं होती तो अधिक संभावना इसी बात की है कि मैं घर वालों की इच्छा के विरुद्ध जाकर गुरु से मुलाकात नहीं कर पाता ।

छुट्टी वाले बरसाती दिन सुबह सुबह जब गुरु घर पर आ गया तो मुझे उसकी गाड़ी में बैठ कर उसके साथ भी आना पड़ा । चाय का कप जो हाथ में था उसे साथ ही ले लिया और गाड़ी में ही समाप्त भी कर दिया । गुरु के घर तक के सफर में गुरु से उसके होम टाउन यात्रा का वर्णन सुनने को मिला परंतु उस वर्णन में एक मस्त यात्री की मस्ती से अधिक कुछ विशेष नहीं था । परंतु जब गुरु ने घर का ताला खोला तो एक शॉक सिर से पैर तक झनझनाहट पैदा करते हुए गुजर गया ।

मुख्य दरवाजा खोलकर जैसे ही ड्राइंग रूम में दाखिल हुए तो वहां 3 प्लास्टिक चेयर, 1 प्लास्टिक की मेज और बड़े बड़े 2 स्पीकर के अतिरिक्त और कुछ नहीं था ।

पिछली बार जब यहाँ आया था तो यही ड्राइंग रूम पूरी तरह भरा हुआ दिखाई दे रहा था । उस वक़्त भी इस जगह पर 3 चेयर, 1 मजे और 2 बड़े स्पीकर ही थे परंतु इसके अलावा दीवार पर हर तरफ बनी रैक्स में किताबों का बहुत बड़ा कलेक्शन था । आज वही कलेक्शन गायब था जिसके कारण पूरा ड्राइंग रूम अजीब तरीके से खाली दिखाई दे रहा था ।

कई वर्ष पहले जब मैंने पहली बार जब इस ड्राइंग रूम में कदम रखे थे तब चारों तरफ रखी हुई किताबों को देख कर पहली बात जो दिमाग में आई वह यही थी कि शायद यह कलेक्शन यहां सजावट के लिए रखा गया है । परंतु यह गलतफहमी जल्दी ही दूर हो गयी । यह ड्राइंग रूम किसी भी अन्य ड्राइंग रूम से अलग था यहां सजावट के नाम पर कुछ भी नहीं था । ना कोई पेंटिंग, ना महंगे सोफे सेट ना कुछ और सजावटी समान । ऐसे में यह सोचना की किताबें सजावट के लिए रखी गयी है अपने आप में तर्कसंगत नहीं लग रहा था ।

ड्राइंग रूम बेशक सजावटी नहीं था परंतु वहां पर हर वो चीज़ उपलब्ध थी जो उपयोगी हो सकती हो । मुझे बहुत सारे लोगों से मिलने का अवसर मिला और अक्सर ऐसा हुआ कि किसी के ड्राइंग रूम में बैठ कर काफी देर तक इंतज़ार करना पड़ा । ऐसे में सबसे अधिक अखरता है इधर उधर नज़र घुमाते रहना क्योंकि करने के लिए और कुछ नहीं होता । कुछ लोगों के ड्राइंग रूम में उनके एल्बम रखे रहते है जो मुझे कभी आकर्षित नहीं कर पाए । गुरु का कहना है कि ऐसे एल्बम अधिकांशतया मूर्खता की निशानी मात्र है । यहां इस ड्राइंग रूम में भी मुझे कई बार इंतज़ार करना पड़ा है परंतु यहां पर इंतज़ार कभी भी अखरता नहीं क्योंकि यहां इंतज़ार का समय या तो किताबे पढ़कर या संगीत सुनकर गुजरा जा सकता है । इसके अलावा यहां एक और सुविधा भी है । इस ड्राइंग रूम में मुझे सज संवर कर पूरी सजगता से बैठने की आवश्यकता कभी भी महसूस नहीं होती । यहां पर में अपनी सुविधा अनुसार जूते खोल कर आराम से जैसे चाहूं बैठ सकता हूँ । अक्सर मांगने पर आराम कुर्सी भी मिल जाती है ।

गुरु के पूरे घर का यही हाल है यहाँ पर फालतू का सजावटी समान दिखाई नहीं देता । यदि कुछ दिखाई देता है तो सिर्फ इस्तेमाल करने लायक समान ।

आज ड्राइंग रूम से सभी किताबें गायब देख कर पहला ख्याल यही आया कि शायद अंदर के कमरे में रख दी होंगी । यही सोच मुझे गुरु के बेडरूम की तरफ ले गयी । बेडरूम के हालात भी ठीक वैसे ही थे । बैडरूम में एक पलंग, 1 मेज और 1 कुर्सी को छोड़ कर बाकी सब खाली दिख रहा था । यहां पर भी पिछली बार चारो तरफ किताबों का बहुत बड़ा संग्रह था परंतु आज सब गायब ।

मालूम हुआ कि गुरु ने अपनी सारी किताबें कम्युनिटी लाइब्रेरी को दे दी है । दो सप्ताह पहले कुल तीन हजार से कुछ अधिक किताबें कम्युनिटी लाइब्रेरी को मिलने की सूचना अखबार में छपी और देखी अवश्य थी परंतु यह बात दिमाग में नहीं आ सकी की ऐसा गुरु ने किया होगा । गुरु को अपनी किताबों से बहुत लगाव था, इतना अधिक की वो अपनी हर किताब का लिखित हिसाब रखता था । अगर कभी कोई किसी किताब को मांग कर ले गया तो उसे लौटना भूल नहीं सकता । गुरु हर हाल में किताब वापिस लेकर अपने रैक में रखता था । एक दफा मुझे बैंगलोर की तरफ जाना था इसलिए गुरु की लाइब्रेरी से मैंने एक किताब ले ली । सफर के दौरान किताब पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाया इसीलिए मैंने किताब लौटने के स्थान पर अपने पास ही रख ली । कई तकाजों के बाद आखिर एक दिन गुरु उस किताब की वसूली करने स्वयं ही पहुंच गया । किताब की वास्तविक कीमत थी तकरीबन 500 रुपये । पुरानी होने के कारण उसकी कीमत होगी यही कोई 100 रुपये । और गुरु ने उस किताब की वसूली के लिए 400 रुपये का पेट्रोल जला दिया था । मैंने हंसते हुए उससे पुछ भी लिया कि आखिर उसने बाजार से नई किताब लेकर अपनी रैक में क्यों नहीं रख दी । गुरु ने भी हंसते हुए कह दिया कि तुम नहीं समझ पाओगे । यह तो नहीं समझ पाया कि आखिर गुरु ने 100 रुपये की किताब के लिए 400 रुपये क्यों जल दिए परंतु यह अवश्य समझ आ गया कि आगे से किताब टाइम पर पढ़ कर वापिस करनी है ।

आखिर ऐसा क्यों हुआ कि अचानक गुरु ने अपनी सारी किताबें लाइब्रेरी को दे दी ?

पहली दफा जब मैंने यहां कदम रखा था तब पहली सोच यही थी कि किताबें सजावट के लिए है । यह सोच अधिक देर तक नहीं रह सकी परंतु इतनी बड़ी संख्या में किताबे देख कर यह ख्याल अवश्य आया कि कोई कारोबारी तौर पर व्यस्त व्यक्ति इतनी सारी किताबें कैसे पढ़ सकता है । जैसे जैसे किताबों के पन्ने पलटने शुरू किये तो हर किताब में जगह जगह पर पन्ने मोड दिए जाने के निशान या पेंसिल से हाईलाइट की हुई लाइन्स देख कर मानना पड़ा कि अधिकांश किताबें पढ़ी गयी है । गुरु की इस लाइब्रेरी में धार्मिक, पौराणिक, फिक्शन, साइंस फिक्शन, हॉरर, हिंदी, इंग्लिश, पंजाबी, संस्कृत आदि की किताबों का संग्रह था ।

हालांकि मुझे पढ़ने का कुछ विशेष शोंक नहीं, बस यात्रा करते वक़्त कुछ पढ़ लिया करता हूँ । ऐसे ही पढ़ी हुई कुछ पुस्तकों पर चर्चा करने का अवसर प्राप्त हुआ जब जाना कि गुरु की पढ़ने की क्षमता जितनी अधिक और विषय जितने विस्तृत है यादाश्त उतनी ही कमजोर । कई बार शरत चंद्र की या मुंशी प्रेमचंद की लिखी किताबों पर चर्चा हुई तो अक्सर यह पाया कि किताब के पात्रों के नाम उलट पलट गए है या कई बार लिखने वाले के नाम भी उलट पलट गए दिखाई दिए । याददाश्त की यह समस्या सिर्फ नामों के साथ ही है । गुरु को नाम याद नहीं रहते । कई बार गुरु हंसते हुए कह भी देता है कि शायद किसी दिन में अपना नाम भी भूल जाऊंगा ।

गुरु की इसी भयानक लाइब्रेरी (भयानक इसीलिए क्योंकि यहां पर हॉरर किताबों का भी बहुत बड़ा संग्रह है) में ही मुझे कई ऐसी किताबें दिखाई दी जिनके वहां होने की उम्मीद कम से कम मुझे नहीं थी । बहुत पहले की बात है जब एक दिन यही से मुझे कुरान मिल गयी थी जिसमें जगह जगह पर पेज मोड़ने और हाईलाइट होने के निशान भी दिखाई दिए । ऐसे ही एक दिन बाइबिल भी मिल गयी । कुछ दिन ही गुजरे थे कि यहीं इसी जगह पर मुझे राम चरित्र मानस, महाभारत, गीता और चारों वेद भी दिखाई दिए । यदि कुछ नहीं मिल सका तो वो था ग्रंथ साहिब । मुझे यकीन था कि इन्ही किताबों के ढेर में ही ग्रंथ साहिब भी मिलेगा परंतु नहीं मिला । वो वहां था ही नहीं ।

आखिर जब सभी धर्मों के धर्म ग्रंथ मौजूद थे तो फिर सिखों का धर्म ग्रंथ गायब क्यों था ? आखिर गुरु किस धर्म को मानता है ?

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