एक था गुरु – ड्राइविंग

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एक था गुरु – ड्राइविंग

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सुबह सुबह बालकनी के बाहर चाय पीते हुए ठंडी बरसाती हवा का आनंद लेना अपने आप में अदभुत है । यदि छुटी का दिन हो तो यकीनन सोने पे सुहागा । यदि पकोड़े भी साथ हो तो यकीनन बेहतरीन दिन हो सकता है परंतु यदि पकोड़े ना भी हो तब भी दिन सोने पे सुहागा ही रहेगा ।

ऐसी ही एक सोने पे सुहागा सुबह सामने वाले गेट पर एक गाड़ी आ कर रुकी तो पहली प्रतिकिर्या झुंझलाहट के अतिरिक्त और क्या हो सकती थी ? पता नहीं कौन आ गया और फ़िज़ूल में भागदौड़ करनी पड़े ।

कभी कभी वैसा हो जाता है जिसकी उम्मीद नहीं होती । आज भी वैसा ही हुआ । गाड़ी से बाहर निकलने वाला चेहरा चिरपरिचित गुरु का था और होठो पर आने वाली मुस्कुराहट यकीनन प्राकृतिक और जीवंत ।

गुरु अक्सर मेरे घर पर नहीं आता हम बाहर मिलते है । मेरे घर पर गुरु का स्वागत नहीं होता । मेरे घर वाले गुरु को पसंद नहीं करते । ज्यादा उचित होगा यदि यह कहा जाए कि मेरे घर वाले गुरु से नफरत करते है और यदि उनका बस चले तो मुझे भी गुरु से मिलने ना दे परंतु कारोबारी मजबूरी ।

यदि कारोबारी मजबूरी ना हो तो क्या मैं स्वयं गुरु से मिलना पसंद करूंगा ?

फिलहाल इस सवाल को रहने देते है ।

मेरे घर में गुरु का स्वागत नहीं होता गुरु इस बात से वाकिफ है इसलिए मेरे घर पर कभी कभी ही आता है और जब आना हो तो यह उम्मीद नहीं करता कि उसे चाय मिल जाएगी । एक बार तो चाय थर्मस में डाल कर भी ले आया था मुझे शर्मिन्दा होना पड़ा इसीलिए दुबारा ऐसा नहीं किया ।

गुरु की गाड़ी को पहचानना मुश्किल नहीं परंतु आज जो गाड़ी आकर रुकी वो गुरु की नहीं थी वो एक छोटी गाड़ी थी शायद आल्टो । शायद इसीलिए की गाड़ी को देख कर नहीं कहा जा सकता की कौनसी गाड़ी है, गाड़ी लंबा सफर तय करके आयी है , चारो तरफ धूल मिट्टी कीचड़ शायद ही कोई ऐसा हिस्सा था जो दिख रहा हो । गुरु के पास आल्टो तो है ही नहीं उसके पास सबसे छोटी गाड़ी भी ecosports है फिर आज आल्टो में कैसे और कहा से ?

पूछने की जरूरत नहीं पड़ी आते ही बता दिया कि वो अपने होम टाउन से आ रहा है और आल्टो उसके पिता की है । जाते वक्त अपनी गाड़ी में गया था और वापिस आते वक्त अपनी गाड़ी अपनी माता के पास छोड़ आया और आल्टो ले आया । अभी यह जानना बाकी था कि आखिर गुरु अपने होम टाउन गया कब , पांच दिन पहले ही तो मिले थे तब तो जाने की कोई बात ही नहीं थी । पता चला कि गुरु पांच दिन पहले ही होम टाउन गया था पूरे छत्तीस घंटे की ड्राइव करके और वहां यही कुछ 15 या 16 घंटे रुक कर वापिस आ गया ।

आखिर ऐसी क्या बात थी कि सिर्फ 15 घंटे रुकने के लिए गुरु ने 36 घंटे + 36 घंटे ड्राइव किया ? और फिर यदि इतना ही रुकना था तो फ्लाइट में भी जाकर आया जा सकता था ड्राइव करने की क्या जरूरत थी ? और फिर अगर ड्राइव करके पहुंच ही गया था तो वापसी की क्या जल्दी थी ?

सही बात यह है कि होम टाउन में उसे कोई काम नहीं था और फ्लाइट से भी जाया जा सकता था परंतु फिर भी ड्राइव करके ही जाना पसंद किया । यह जरूरत का नहीं पसंद का मामला है । वापसी की जल्दी कारोबारी मजबूरी के अतिरिक्त कुछ और नहीं थी । तो क्या यह संभव था कि गुरु जाना टाल देता और 10 या 15 दिन बाद तब जाता जब वापसी की जल्दी नहीं होती । यदि मेरी बात होती तो मैंने यकीनन यही किया होता परंतु गुरु का कहना है कि मिलने की इच्छा आज हो रही है और 10 या 15 दिन बाद का प्रोग्राम बनाया जाए ऐसी भी कोई मजबूरी नहीं थी ।

गाड़ी ड्राइव करने के लिए ड्राइवर नहीं रखा, बल्कि खुद ही ड्राइव करना गुरु को पसंद है । उसे आराम से गाड़ी ड्राइव करते हुए और रास्ते में रुकते हुए ड्राइव करना पसंद है । शायद ड्राइविंग गुरु को प्राकृतिक काबलियत के तौर पर मिला है ।

गुरु का कहना है कि वो ट्रक ड्राइवर बनाना चाहता था । और मेरा कहना है कि गुरु ट्रक ड्राइवर बन भी जाता यदि उसके कोशिश की होती । उसकी ड्राइविंग की काबिलियत और रास्ते में होटलों को छोड़ कर ढाबों पर रुकने की आदत कुछ वैसी ही है जैसी की ट्रक ड्राइवर की होती है । गुरु ड्राइवर बन सकता था परंतु उसने कोशिश ही नहीं कि । वक़्त के साथ साथ जैसे जैसे गुरु बडा होता गया उसकी इच्छाएं भी बदलती चली गयी । एक वक्त ऐसा भी आया जब गुरु में कंप्यूटर इंजीनियर बनने की इच्छा जागृत हुई परंतु उस रास्ते पर भी गुरु ने चलना पसंद नहीं किया । उसने उस रास्ते पर चलना पसंद किया जो उसे शिक्षा से जोड़ सकता था । परंतु किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था । गुरु ने जिस रास्ते को शिक्षा से जुड़ने के लिए चुना आखिर वही रास्ता उसे कंप्यूटर के बहुत नजदीक ले आया । इतना नज़दीक की जब गुरु ड्राइविंग नहीं कर रहा होता या जब खाली होता है वो सॉफ्टवेयर डेवेलोप करने में अपना वक़्त गुजरता है । और जब सॉफ्टवेयर पर काम नहीं करना हो तब किताबें पढ़ना । तीसरा कोई ऐसा काम मुझे ज्ञात नहीं जो गुरु अपने खाली वक़्त में करता हो ।

गुरु के सिर्फ तीन शोंक है सबसे ऊपर ड्राइविंग करना, दूसरा शोंक सॉफ्टवेयर डेवेलोप करना और अंत में किताबें पढ़ना ।

ड्राइविंग गुरु का पहला शोंक है, और बचपन में गुरु ट्रक ड्राइवर बनना चाहता था ऐसे में यह सवाल अपने आप में दिलचस्प है कि गुरु ने ड्राइविंग कब और किससे सीखी । और इस सवाल का जवाब बहुत ही अप्रत्याशित है । एक दिलचस्प घटना से गुरु की ड्राइविंग शुरू हुई ।

बहुत साल पहले की बात है जब गुरु लगभग 30 वर्ष का रहा होगा । उसकी शादी नहीं हुई थी परंतु मंगनी हो चुकी थी । एक दिन फ़ोन पर गुरु की होने वाली पत्नी ने उससे कहा कि उसके पिता गुरु को शादी में गाड़ी देने की सोच रहे है । और यही वो पल था जब गुरु को ध्यान आया कि उसे तो ड्राइविंग आती ही नहीं । गुरु को 30 वर्ष का होने तक ड्राइविंग नहीं आती थी इसलिए मैंने कहा कि गुरु बेशक ट्रक ड्राइवर बनाना चाहता होगा परंतु उसने कोशिश ही नहीं कि । जैसे ही गुरु को ध्यान आया कि उसे ड्राइविंग नहीं आती उसने ड्राइविंग सीखने का निश्चय कर लिया । अगले ही दिन गुरु ने एक ड्राइविंग स्कूल जॉइन कर लिया और ठीक एक महीने बाद एकदम नई चमचमाती सेंट्रो कार उसके दरवाजे के सामने खड़ी थी । अभी गुरु की शादी नहीं हुई थी इसीलिए गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि गाड़ी उसकी होने वाली पत्नी के पिता ने दी । गाड़ी खुद गुरु अपनी मेहनत के पैसे से लेकर आया था । मेरी नज़र में यह बहुत महत्वपूर्ण घटना बनी गुरु के जीवन की । उसी सेंट्रो कार से गुरु ने लगभग पूरा भारत घूम लिया और लगभग एक साल गुजरते गुजरते गुरु की ड्राइविंग क्षमता भी बेहतरीन हो चुकी थी । इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कारणों से भी सेंट्रो बहुत महत्वपूर्ण रही । कम से कम एक कारण अवश्य सबसे महत्वपूर्ण है जिसका जिक्कर में आगे किसी अन्य जगह करूंगा ।

आज तकरीबन 15 वर्ष बाद सेंट्रो गुरु के पास नहीं है । अक्सर लोग अपनी पहली गाड़ी या बाइक के साथ इमोशनल रूप से जुड़े रहते है परंतु गुरु के साथ यह समस्या नहीं है । आज गुरु के पास तीन गाड़िया है और किसी अन्य गाड़ी से उसे कोई मतलब नहीं ।

कभी कभी किस्मत या शायद संयोग कुछ विचित्र रूप से सामने आते है ऐसा ही एक संयोग गुरु की गाड़ियों के साथ भी रहा है । गुरु के पास किसी जमाने में सेंट्रो थी और आज उसके पास तीन गाड़िया है । कुल मिलाकर गुरु ने 4 बार गाड़ी का नंबर लिया । इसके अलावा एक दफा उसने सेंट्रो का एक स्टेट से दूसरे में ट्रांसफर भी करवाया । इसका अर्थ है कि गुरु ने कुल पांच बार RTO से गाड़ी का नंबर लिया और हर बार उसे ऐसा नंबर मिला जिसके चार डिजिट का योग 26 बनता है । 26 जोकि गुरु का जन्मदिन भी है । और गुरु का कहना है कि यह पूर्ण रूप से सांयोगिक है । हालांकि 5 बार इस तरह का संयोग यकीन करना मुश्किल है परंतु मुझे जानकारी है कि गुरु विशेष परिस्थितियों के अलावा झूठ नहीं बोलता ।

आज जब गुरु आया तब हल्की बूंदा बांदी हो रही थी और चाय हाथ में थी ही ऐसे में गुरु के आने का अर्थ था कि मुझे उसके साथ बाहर जाना पड़ेगा क्योंकि उसका घर पर आना मेरे घरवालों को पसंद नहीं । परंतु इससे कोई विशेष परेशानी नहीं होने वाली क्योंकि चाय का कप हाथ में है ही और पकोड़े का इंतज़ाम निश्चित रूप से होगा ही । हर बारिश और छुट्टी वाले दिन पकोड़े बनाना गुरु का निश्चित कार्यक्रम है ।

गुरु को मेरे घर वाले इतना नापसंद क्यों करते है और यदि मेरे पास चुनने का अवसर हो तब भी क्या मैं गुरु से मिलना पसंद करूंगा ?

क्रमशः

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