जी-वॉर (G-War) – 02

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जी-वॉर (G-War)

 

 

Chapter – 02

डॉक्टर प्रशांत का सम्बन्ध देश की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला से था जोकि ITTR (Institute for Time Travel Research)  का हिस्सा थी और जिसका मुख्य कार्य समय यात्रा से सम्बंधित बायोलॉजिकल समस्याओं पर अनुसंधान करना था | डॉक्टर प्रशांत ने अपना कार्य इसी लैब से आरम्भ किया था | इसी लैब में प्रोफेसर गगन के निर्देशन में डॉक्ट्रेट करने के पश्चात् प्रोफेसर गगन के अधीन ही अनुसन्धान कार्य को आगे बढ़ाया | प्रोफेसर गगन अपने समय पर रिटायर होकर चले गए परन्तु रिटायर होने से पहले उन्होंने डॉक्टर प्रशांत के सामने सुनहरे भविष्य की नीव रख दी थी | वर्तमान में डॉक्टर प्रशांत अपनी लैब में बहुत ही महतवपूर्ण रिसर्च को अंजाम दे रहे थे | उनकी रिसर्च का ही परिणाम था की चद रोज़ पहले ही कैप्टेन रमाकांत अवं कैप्टेन मनोज समय यात्रा कर के वापिस आये थे | 

हालांकि कप्तान रमाकांत एवं मनोज की समय यात्रा अभी तक संदिग्ध थी शायद यही कारण था की अभी तक सरकारी तौर पर इस सफलता की घोषणा नहीं की गयी थी | कैप्टेन रमाकांत एवं मनोज को समय यात्रा सम्बन्धी मशीन में बैठाया गया और सभी आवश्यक निर्देशों का पालन किया गया | कुछ समय पश्चात् कप्तान रमाकांत एवं मनोज सुरक्षित मशीन से बाहर निकाल लिए गए और पूर्व निर्धारित दिशानिर्देशों के अंतर्गत दोनों को आइसोलेशन में सुरक्षित तरीके से पहुंचा दिया गया | 

मशीन से प्राप्त आकड़ों के अनुसार कैप्टेन रमाकांत एवं मनोज समय में 1000 वर्ष आगे की यात्रा कर के आये थे परन्तु मशीन द्वारा प्राप्त अन्य आकड़े पृथ्वी का जो रूप सामने रख रहे थे वह वर्तमान पृथ्वी से इतना अलग था की देश अथवा विदेश का कोई भी वैज्ञानिक इन आकड़ो पर विश्वास नहीं कर पाया | नतीजा वैज्ञानिकों के दो गुट बन गए एक वह जो प्रयोग को असफल बता रहे थे और दूसरे वह जिनका मानना था की आगे आने वाले 1000 वर्ष पृथ्वी के लिए क्रन्तिकारी बदलाव लेकर आने वाले है | सच चाहे जो हो कोई भी गुट निश्चयात्मक तौर पर कुछ भी कहने की अवस्था में नहीं था |

ऐसे माहौल में कप्तान रमाकांत एवं मनोज का बयान बहुत महत्वपूर्ण बन गया था | इससे पूर्व की दोनों का बयान दर्ज़ किया जाये यह आवश्यक था की दोनों की शारीरिक एवं मानसिक अवस्था का परिक्षण किया जाये और डॉक्टर प्रशांत के निर्देशन में डॉक्टरों की एक टीम यही काम कर रही थी | 

डॉक्टरों की टीम अभी अपने परिक्षण कर ही रही थी की समुन्दर में तूफान के आने के संकेत मिलने आरम्भ हुए और मौसम विभाग से लगातार मिल रही चेतावनी के मद्देनज़र डॉक्टर प्रशांत को परिक्षण का कार्य कुछ समय के लिए बंद करके सुरक्षात्मक कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा | पिछले 2 दिन डॉक्टर प्रशांत ने सभी तरह के परिक्षण बंद रखे थे परन्तु समय बिताने के लिए वह लगातार कैप्टेन रमाकांत एवं मनोज के संपर्क में थे | उनसे हुई बातचीत डॉक्टर प्रशांत को प्रयोग की सफलता के प्रति दृढ कर रही थी और तूफ़ान से हुई तबाही ने सारी मेहनत बर्बाद कर दी थी | 

लैब पूरी तरह धवस्त हो चुकी थी जहाँ लैब होनी चाहिए थे वहां खाली मैदान दिखाई दे रहा था यहां तक की लैब का मलबा भी समुन्दर में समा चूका था | यही लैब डॉक्टर की अभी तक की मेहनत थी और अपनी सालों की मेहनत यूं समुन्दर में समाते देख डॉक्टर खुद को सम्हाल नहीं पाए और वही बैठ गए | डॉक्टर को खुद को सम्हालने में काफी वक़्त लगा जब उनका मस्तिष्क कुछ सोचने समझने लायक हुआ तब तक कुछ और लोग भी अपने बिखरे हुए घरों से बाहर आ गए थे | डॉक्टर धीरे धीरे पूरी सावधानी के साथ उस तरफ बढ़ गए जिस तरफ लैब थी | उनकी लैब देश की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में से थी और उसमे कई तरह के रसायन आदि मौजूद थे इसीलिए डॉक्टर को तुरंत ही सुरक्षात्मक कदम उठाने थे | परन्तु किसी निश्चय पर पहुँचने से पहले उन्होंने जरूरी समझा की लैब को नज़दीक से देख लिया जाये | परन्तु यह खतरनाक भी था किसी भी समय कोई रसायन अथवा कोई अन्य उपकरण दुर्घटना का कारण  बन सकता था | परन्तु जो जरूरी था उसे करना ही था | 

डॉक्टर की लैब जितनी ज़मीन के ऊपर थी उतनी ही जमीन के नीचे भी थी और डॉक्टर को यह देखकर संतुष्टि हुई की ज़मीन के नीचे वाला हिस्सा सुरक्षित है और उसी सुरक्षित हिस्से में कैप्टेन रमाकांत एवं मनोज भी सुरक्षित थे | यदि कुछ स्थानों पर हुए हलके नुक्सान को छोड़ दिया जाये तो लैब का निचला हिस्सा सुरक्षित था | लैब के निचे जाने वाले सभी रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके थे इसीलिए आवश्यक था की तुरंत ही कारवाही की जाये | डॉक्टर प्रशांत ने अपनी लैब के आसपास लाल कपडे तलाश करके बिखेर दिए | उनकी समझ के मुताबिक लाल कपडे किसी को लैब के नज़दीक नहीं आने देने का संकेत कर सकते थे | हलाकि संकेत स्पष्ट नहीं था परन्तु इससे अधिक कुछ कर पाना संभव नहीं था | 

संचार के सभी साधन व्यर्थ हो चुके थे सिर्फ एक ही रास्ता उपलब्ध था और डॉक्टर ने उसी साधन का इस्तेमाल किया | डॉक्टर तुरंत ही अपने विभाग के डिजास्टर मैनेजमेंट भवन की तरफ पैदल बढ़ गए | परन्तु डिजास्टर मैनेजमेंट टीम को स्वयं सहायता की आवशयकता था | डॉक्टर लगभग भागते हुए डायरेक्टर के बंगल पर पहुंचे | प्रशासन से किसी किस्म की सहायता डायरेक्टर के आदेश से ही ली जा सकती थी परन्तु डॉक्टर को निराशा के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं आया | डायरेक्टर का बंगला पूरी तरह तबाह हो चुका था यह कहना मुश्किल था की डायरेक्टर बंगल के मलबे के नीचे दबे है अथवा समुद्र में समा गए | उपनिर्देशक का बंगला निर्देशक के बंगल के पास ही था परन्तु परिथिति वहां भी आशाजनक नहीं थी | 

डॉक्टर के पास अपनी प्रयोगशाला का स्वतंत्र अधिकार था इसीलिए उन्होंने निश्चय करने में अधिक समय व्यर्थ नहीं गवाया और प्रशासन से मदद की आशा में विभाग के बाहर आ गए |  शहर का दृश्य भी उतना ही वीभत्स था जितना की विभाग के अंदर | चारों तरफ तबाही के लक्षण थे सड़के पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी जगह जगह गिरे हुए पेड़ों ने रास्ता रोक रखा था | डॉक्टर समझ नहीं  पा रहे थे की यदि प्रशासन से मदद हासिल हो भी जाये तब भी उनकी टीम प्रयोगशाला तक कैसे आएगी |  निराशाजनक माहौल में भी डॉक्टर को कुछ न कुछ करना ही था इसीलिए वह सब बाधाओं को पार करते हुए उस तरफ बढ़ते रहे जहाँ सहायता केंद्र स्थापित किया गया था | रास्ते में अनेक बढ़ाएं थी परन्तु कई घंटो के परिश्रम के बाद डॉक्टर शहर से बाहर बनाये गए सहायता कैंप तक पहुँच पाए और पप्रशासन से संपर्क कर पाए और यहाँ मिली जानकारी ने एक बार फिर से डॉक्टर को झंझोर कर रख दिया उनके पास तुरंत ही वापिस लौटने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा था | 

सहायता केंद्र पर डॉक्टर को बताया गया की उनकी लैब के सम्बन्ध में सहायता केंद्र पर विशेष निर्देश मौजूद थे इसीलिए जैसे ही तूफान कमजोर हुआ सहायता टीम लैब की तरफ रवाना कर दी गयी थी | और संभव है की टीम वहां पहुँच गयी हो और अपना कार्य आरम्भ कर दिया हो | परन्तु डॉक्टर के लिए यह समाचार सांत्वना देने वाला नहीं था | डॉक्टर जानते थे की उनकी लैब अति संवेदनशील है और उसे बहुत सावधानी से विशेष दिशा निर्देश के द्वारा ही सुरक्षित रखा जा सकता है | प्रयोगशाला में बहुत अधिक नुकसान हुआ था परन्तु प्रयोगशाला के तहखानों में बहुत कुछ सुरक्षित था और उसे तभी सुरक्षित रखा जा सकता था जब डॉक्टर अपने अथवा किसी अन्य विद्वान के दिशा निर्देश में सहायता कार्य किया जाये | इसीलिए डॉक्टर को तुरंत लौटना पड़ा | 

वापसी का मार्ग उतना जटिल नहीं था जितना की सहायता केंद्र तक पहुँचने का था रास्ते की बाधाओं के हटा कर ही डॉक्टर यहाँ तक पहुंचे थे इसके बावजूद कई बाधाओं को हटाना बाकि था और फिर इस वक़्त डॉक्टर का दिमाग पूरी तरह सक्रीय था | डॉक्टर को सहायता केंद्र आते वक़्त कहीं भी सहायता टीम नहीं मिली थी इससे डॉक्टर जल्द ही इस निश्चय पर पहुँच गए की सहायता टीम समुन्द्र के किनारे किनारे उनकी लैब तक गयी होगी | समुन्दर किनारे का रास्ता लम्बा परन्तु बाधारहित होना स्वाभाविक था और डॉक्टर भी समुन्दर के किनारे किनारे प्रयोगशाला की तरफ चल पड़े | डॉक्टर जल्द से जल्द लैब तक पहुंचना चाहते थे इसीलिए उन्होंने ना तो अपनी थकान की परवाह की और ना ही रेत में धसते पैरों की वह तेज़ी से चलते चले गए और जब अपनी प्रयोगशाला के नज़दीक पहुँच कर उन्होंने सहायता टीम की तरफ देखा तो वह समझ गए की जिस अनर्थ को वह रोकना चाहते थे वह हो चूका है